अखिलेश यादव: ना चाचा के, ना बुआ के

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उत्तर प्रदेश की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में बहुत ही दिलचस्प मोड़ पर आ गई है। जहां 2019 के लोकसभा चुनाव में बुआ बबुआ का गठबंधन हुआ। वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी और समाजवादी पार्टी में एक गठबंधन देखने को मिला। दिलचस्प बात यह रही कि इन दोनों गठबंधनों का जोड़ ज्यादा दिन तक नहीं चल सका।

चुनाव और गठबंधन

विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को मुंह की खानी पड़ी। जिसके बाद उन्होंने अपना गठबंधन तोड़ लिया। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने गठबंधन पर उठने वाले सवालों का अपने तरीके से खंडन किया। राहुल गांधी और अखिलेश की यह जोड़ी ज्यादा दूर तक नहीं चल सकी।

माया अखिलेश का साथ

इसके बाद लोकसभा चुनाव के पहले भी एक गठबंधन देखने को मिला। जहां उत्तर प्रदेश के दो बड़े चेहरे मायावती और अखिलेश यादव साथ आ गए। इसके बाद यह अनुमान लगाया जा रहा था कि यह दोनों दिग्गज मोदी को पछाड़ देंगे। लेकिन चुनाव परिणाम इसके ठीक विपरीत निकल कर आया। जहां नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में जबरदस्त जीत हासिल की।

सपा से गठबंधन बड़ी भूल

इस पूरे गठबंधन का फायदा मायावती को हुआ और नुकसान अखिलेश यादव को। लेकिन इसके बावजूद भी मायावती ने अखिलेश यादव पर कई सवाल खड़े कर दिए। हाल ही में उनकी तरफ से आवाज सुनने को मिली कि समाजवादी पार्टी से गठबंधन करना बड़ी भूल थी। जबकि अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो 2014 के चुनाव में बसपा का खाता नहीं खुला था। वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा 10 सीटें जीतकर दूसरी बड़ी पार्टी बनकर उभरी।

अखिलेश की बड़ी राजनीतिक हार

वहीं दूसरी तरफ अखिलेश यादव अपने परिवार की भी कई सीटें हार गए। लेकिन इन सब के बावजूद भी बुआ ने भतीजे पर कई तंज कसे। परिणाम स्वरुप अब गठबंधन टूट चुका है और 2022 के चुनाव के लिए अलग-अलग तैयारी हो रही है।

अखिलेश यादव का राजनीतिक करियर बहुत ही दिलचस्प रहा है। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके चाचा शिवपाल यादव से अनबन का मामला सुर्खियों में रहा। इसके बाद पार्टी में कई तरीके की बातें होने लगी। अखिलेश यादव अध्यक्ष बन गए, मुलायम सिंह यादव संरक्षक बन गए और शिवपाल यादव पार्टी से बाहर हो गए।

चाचा के दांव से भतीजा पस्त

चाचा से मनमुटाव अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी को भारी पड़ गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में जहां समाजवादी पार्टी बहुत मजबूत नजर आ रही थी। लेकिन चाचा शिवपाल यादव की राजनीतिक समझ और कूटनीति के आगे सब फेल हो गया। इसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को हुआ।

Adityamishravoice

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