फिर मेरी याद (कुमार विश्वास) -: एक नज़र

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कुमार विश्वास, हिंदी साहित्य और कवि सम्मेलन की दुनिया में एक लोकप्रिय नाम हैं। विशेषकर युवाओं में इनकी लोकप्रियता काफी ज्यादा है. पिछले साल कुमार विश्वास की तीसरी किताब ‘फिर मेरी याद‘ पाठकों तक पहुंची. इसके पहले भी कुमार विश्वास दो किताबें लिख चुके हैं. ‘फिर मेरी याद‘ का पहला संस्करण सितंबर 2019 में आया था।

यह किताब राजकमल प्रकाशन के द्वारा छापी गई है, जिसका मूल्य ₹199 है। कुल 175 पेजों की इस किताब में कुमार विश्वास ने अपने चिर परिचित अंदाज में कविताओं और पंक्तियों को संकलित किया है। जिनमें गीत, कविता, मुक्तक, क़ता, आज़ाद अशआर मिलेंगे। किताब में कवि सम्मेलन के दौरान की कई ऐसी कविताएं जो कुमार विश्वास ने सुनाई है, वह भी मौजूद हैं। इसके साथ ही अन्य बेहतरीन रचनाओं को इसमें जगह दी गई है।

वैसे तो पूरी किताब का प्रस्तुतीकरण काफी अच्छे तरीके से किया गया है, लेकिन कुछ रचनाएं दिल को छू जाती हैं-:

• बहुत देर से सोकर जागी
• सच के लिए लड़ो मत साथी
• शांत रहो, कोलाहल है!
• अब से हम भी मौन रहेंगे
• इस साल ना हो पुर-नम आंखें
• माँ
• बोलो रानी क्या नाम करूं?
• साल मुबारक.

सामाजिक माहौल, प्रेम, राजनीति जैसे विषयों पर बेबाक राय रखने वाले कुमार विश्वास, किताब में भी उसी अंदाज में नजर आते हैं। कवि सम्मेलन में कुमार विश्वास के द्वारा चार चार पंक्तियों का लाजवाब प्रस्तुतीकरण, जिसे सुनकर सभी मचल उठते हैं। इस किताब में आपको पढ़ने को मिल सकता है।

कई कविताएं दिल को छू कर गुजर जाती है, लेकिन उनकी कुछ पंक्तियां ठहर कर सोचने को मजबूर कर देती हैं। जैसे-:

• खुद को शून्य बनाना भी कितना विराट होता है
• अभी अभी ‘हम’ होकर पिघला सब कुछ ‘तेरा मेरा’
• पर जिस दिन प्यास बंधी तट पर, पनघट इस घट में अटक गया
• दूर धरती के कांधे पे देखो, आसमां झूमकर झुक गया है
• लेकिन मैं हर चतुराई की सोची-समझी नादानी हूं
• जिस्म के पत्थर से वक्त का पानी
• सूरज बुझता हो बुझ जाए, तेरे(चांद) छिपने से घबराऊं
• किरणों को दागी़ बतलाना, या दर्पण से आंख चुराना. कीचड़ में धंस कर औरों को, गंगा जी की राह बताना. इस सब से ही अंधकार का सूरज चढ़ता है.
• मतदाता से कहा भूख ने लोकतंत्र ही राशन है. संसद की लाचारी बोली चुप्पी चीखों का हल है.
• ओढ़नी इस तरह उलझे की क़फ़न हो जाए
• इतनी भटकन है मेरी सोच के परिंदों में, मैं खुद से मिलता नहीं भीड़ में, अकेले में.

किताब की भाषा काफी सरल और सटीक रखी गई है, लेकिन कई जगहों पर उर्दू के कठिन शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इसके साथ ही हिंदी की भी अच्छी भाषा शैली का इस्तेमाल है। किताब को एक बार में अच्छे से पढ़ा और समझा जा सकता है। कुछ रचनाएं ऐसी हैं, जिन्हें दोबारा पढ़ने का भी जी करता है।

-Adityamishravoice