ठंडी में ठिठुरती धूप

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ठंडी की धूप में तो चिड़ियाघर का शेर ही नहीं, घर में छुपा गीदड़ भी बाहर निकल आता है। धूप में कुछ बात तो है, सब की छत पर बराबर पड़ती है। हां शहर में थोड़ा ऊंची ऊंची इमारतों के बीच कई छोटे मकान रह जाते हैं, लेकिन उनका भी एक कोना धूप में नजर आ ही जाता है। वैसे सही भी है, ये ऊंची इमारतों वाले टैक्स भी ज्यादा देते हैं। ऐसे में उन्हें ज्यादा धूप लेने का हक भी है।

इस धूप में सारे घर खाली हो जाते हैं और छत भर जाती है। जहां एक ओर धूप में रस्सियों पर कपड़ों की रंग बिरंगी कतार दिख जाएगी, वहीं छत पर ही खेलते बच्चे और धूप सेकते परिवार के लोग मिल जाएंगे। ठंडी में धूप में बैठने का मजा ही अलग है, लेकिन ज्यादा विटामिन डी आपको आलसी भी बना देती है।

बचपन में याद है, जिस दिन अच्छी धूप खिलती थी। अध्यापक लोग कक्षा से बाहर पढ़ाया करते थे। उस दिन पढ़ाई नहीं होती थी, सिर्फ सभी बैठकर विटामिन डी लेते थे। हालांकि वह ना होने वाली पढ़ाई भी बहुत कुछ सिखा देती थी। आजकल के फाइव स्टार स्कूलों में ऐसी धूप छाते लगा कर आती है। शिक्षक अगर बच्चों को बाहर बिठा दें तो अगले दिन शिक्षा मंत्री तक कटघरे में आ जाएंगे।

अब धीरे-धीरे दौर बदल गया है, छत पर लोगों की संख्या कम हो गई है। कपड़े भी वाशिंग मशीन में ही सूख जाते हैं, क्योंकि धूप में उनके रंग उड़ने का खतरा रहता है। कुछ-कुछ यही खतरा चेहरे का भी होता है, इसीलिए अब लोग धूप में ना बैठकर विटामिन डी की गोलियां खाते हैं।

आसमान में सूरज भी अब निकलते हैं और 9 to 5 की शिफ्ट खत्म होने का इंतजार करते रहते हैं। उन्हें भी पता है कि अब ना छत पर कोई कपड़े सुखाने आएगा, ना शरीर। मुझे तो लगता है कि एक समय के बाद सूरज भी एक दिन छोड़कर निकलना शुरू कर देगा। सोमवार, बुधवार और शुक्रवार या फिर मंगलवार, बृहस्पतिवार और शनिवार।

शहर में धूप को सर के ऊपर आ जाने पर ही महसूस किया जाता है, क्योंकि सूरज तो जल्दी उठ जाता है लेकिन शहर वाले नहीं। अब गुड मॉर्निंग बोलने के लिए सूरज निकलने का नहीं आंख खुलने का इंतजार रहता है। सही भी है, जब जागो तभी सवेरा।

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