राजनीतिक बाज़ार

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बाजार का एक उसूल है, यहां हर एक वस्तु का मूल्य निर्धारित होता है। एक दिन बाजार में खरीदारी करते करते एक शो रूम में विधायक जी भी दिख गए। घर पे तो कभी मिलते नहीं, बाजार में ही सही। हम भी पहुंच गए और अपनी बात उनके सामने रखते हुए आसपास नजर दौड़ाई। चारों तरफ शीशे लगे थे, फिर भी शायद विधायक जी खुद को देख नहीं पा रहे थे। पार्टी के झंडे वाला अंगोछा पहन रखा था, अब यही इनका पहनावा और पहचान बनकर रह गए था।

शोरूम में इनकी ही तरह कई अन्य विधायकगण विराजमान थे। वह शोरूम नहीं, बिल्कुल विधानसभा लग रहा था। हां, विपक्ष की कमी ज़रूर थी। कुछ अपने भी गायब थे। वैसे विपक्ष भी बगल के किराना स्टोर टाइप होता है, जो ज्यादा ग्राहक और ज्यादा मुनाफा की तलाश में रहता है। वैसे भी विपक्ष सरकार का ही आकार होता है।

पर सरकार तो सरकार है, जब तक सत्ता का साथ है सब हरा भरा नजर आता है। वही कुर्सी सत्ता जाने के बाद कांटो वाली हो जाती है, नेता भी सदा अभिनेता ही रहना चाहता है। खैर मामला समझते देर न लगी कि इस बाजार में भी मोलभाव जारी है, सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे। विधायक जी ने कहा ‘आप बाद में आना’। मैंने कहा ‘आप विधायक रहोगे तब तक!’ बोले -क्या? मैंने जवाब दिया मतलब तब भी आप विधायक जी, फ्री रहोगे ना! उन्होंने हां में सर हिला दिया।

उनका साथ अन्य विधायक भी दे रहे थे, दुकान में ऊपर गेस्ट हाउस भी था। मुख्य बाजार तो यहीं लगी थी, पर यह भवन मुख्य बाजार से थोड़ा कोने में था। मैं नमस्कार कर, वहां से जाने लगा। तभी ऊपर से किसी ने आवाज दी, सभी विधायक कतार में सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने लगे। पर मुझे यह सीढ़ी उलटी दिशा में जाती दिख रही थी। फिर याद आया राजनीति में गंगा उलटी ही बहती है।

Adityamishravoice

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