जनता कर्फ्यू और सुबह

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प्रकृति का सही रंग रूप, देखने को मिल रहा है,
देखो तो बाहर सूरज भी, खामोशी से ही निकल रहा है।
चिड़ियों ने पंख, और ज्यादा ही फैलाए हैं,
पेड़ भी डालियों पर आज, अंकुश ना लगा पाए हैं।
सुबह की शुरुआत पहली पहल से हुई है,
नया भारत नई खुशबू, फिजाओं में बही है।
खिड़की के भीतर चहल-पहल का दौर है,
बाहर सब कुछ मंद है,
ना तेज हॉर्न, न आगे आने की होड़ है।
घर के पुराने कोने भी आज गुलज़ार हो गए,
जनता कर्फ्यू क्या लगा, दिन के घंटे हजार हो गए।
पहल है ऐसी, जहां वक्त को थामना है,
रिफ्रेश करना है खुद को,
जिंदगी की सर्विसिंग कराना है।
आज ना कहीं चिमनियों से धुआं,
ना वाहनों का शोर होगा।
सब कुछ ठहर जाएगा, फिर भी मनोबल ना कमजोर होगा।
आंखें बंद कर थोड़ा एकांत को सुनो
बाहर की कशमकश छोड़, भावनाओं के प्रशांत को सुनो।।

adityamishravoice

5 thoughts on “जनता कर्फ्यू और सुबह

  1. The best is to respect the curfew. The virus is affecting many countries in the world. And before it gets stronger, it is better to be prepared.
    Your poem represents that request with verses that carry that message. And it is very good that you spread it.
    I enjoyed reading it.
    Manuel

    Liked by 2 people

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