डिजिटल डिस्टेंसिंग

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सोशल डिस्टेंसिंग के माध्यम से हम अपने शरीर को स्वस्थ रख रहे हैं, उसी तरह स्वस्थ दिमाग के लिए डिजिटल डिस्टेंसिंग आवश्यक है। हम आवश्यकता से अधिक अगर किसी चीज का इस्तेमाल करने लगे तो धीरे-धीरे उसकी लत भी लग जाती है। उदाहरण के तौर पर मोबाइल और सोशल मीडिया का इस्तेमाल ही लेकर चलते हैं। सुविधा को भी सुविधा के आधार पर उपयोग में लाना गलत नहीं है, पर एक वक्त के बाद जब मोबाइल की बैटरी ऑक्सीजन से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाए तो सवाल उठने लगते हैं।

आधुनिक डिजिटल उपकरण हमारे चौमुखी विकास के लिए बहुत आवश्यक है। अपने हाथ से पूरे विश्व को नियंत्रित करने की ताकत डिजिटल वर्ल्ड में है। समय की गति से सूचनाओं का प्रसार हो जाता है, लेकिन इसका एक और पहलू है। जिसे हम नजरअंदाज करते जा रहे हैं। सोशल मीडिया की दुनिया और मोबाइल स्क्रीन के बाहर भी बहुत कुछ सुंदर और रोचक है। लेकिन हम आजकल अपना चेहरा भी शीशे में नहीं, सेल्फी में देखते हैं। हमारी अपनी वास्तविकता पर डिजिटल पर्दा पड़ता जा रहा है। क्षण भर के लिए अगर हम फोन से दूर चले भी जाते हैं, तब भी हमारा दिमाग उधर ही घूमता रहता है। हमारी दिन भर की सारी हरकतें इससे प्रभावित होती हैं। जैसा हम डिजिटल मीडिया में देखते- सुनते हैं, उसी तरह बदलते जा रहे हैं।

जरूरत है फोन से दो हाथ की दूरी बनाने की,
जरूरत है बिना व्हाट्सएप जोक के भी मुस्कुराने की।
जरूरत है हवाओं के साथ झूमने की,
थोड़ा इधर थोड़ा उधर, बिना कैमरा घूमने की।
बस इसी जरूरत में जिंदगी का सार छिपा है,
सोशल मीडिया के बाहर भी देखो
पूरा संसार बसा है।।

इसे डिस्टल बैलेंस कहा जा सकता है। खुद को इस दलदल से निकालकर खुले आसमान में टहलने और घूमने का नाम जिंदगी है। बिना मोबाइल आजकल जीवन क्या, पूरा दिन बीत जाए बड़ी बात है! पर उसके कुल इस्तेमाल और समय सीमा पर थोड़ा रोक लगाना संभव है। अपनी आंखों को फोन से हटा कर बाहर के 3डी नजारों की तरफ मोड़ो, दुनिया भी रंगमंच है, कलाकारों से भरी पड़ी है। उनको देखो, समझो और सीखो।

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कैसे एक छोटा बच्चा मां से आइसक्रीम की जिद कर चाट भी खा लेता है। वहीं दूसरी तरफ कैसे एक कर्मचारी अपनी मेहनत की कमाई के लिए पसीना बहाता है। कैसे नेता जनता को हर 5 साल बाद उसी हंसी और खुशी का जाम पिला जाते हैं, जो उनके जाते ही धुंआ हो जाता है। कैसे आम आदमी समस्याओं का सामना करके भी जी भर कर मुस्कुराता है!

Adityamishravoice

14 thoughts on “डिजिटल डिस्टेंसिंग

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