मजदूर हैं, मजबूर भी

#मज़दूर #lockdown #adityamishravoice #blog #politics

उड़ती प्लेन और चलती ट्रेन के, एक कोने में ही कोई बिठा दे,
चलते चलते पांव और पेट जवाब दे रहे हैं.
बड़ी दूर है गांव, कहीं छांव भी नहीं,
क्या सरकार को हमारी परवाह ही नहीं?
शायद अभी चुनाव दूर है, इसीलिए वह मजबूर हैं.
पर पेट तो हमारा भी है, माना कि हम मजदूर हैं.
हमारा खर्च कौन उठाएगा, यह बहस हो रही.
इधर मीलों चल चुके लोगों की, सांस थम रही
सिर पर गठरी और परिवार का बोझ है,
क्या हमारा भी कोई हिसाब है, किसी को हमारी भी खोज है!
कुछ कुछ दूरी पर चल कर, बैठ जाते हैं,
कभी आगे कभी पीछे, उम्मीद में देखे जाते हैं.
कोई तो आए, जो ताली और थाली न सही
गाली देकर ही, बस घर पहुंचा दे.
कब तक चलेंगे इन रास्तों पर, थोड़ा गांव को ही पास बुला दे.

– Adityamishravoice

16 thoughts on “मजदूर हैं, मजबूर भी

  1. बड़ी दूर है गांव, कहीं छांव भी नहीं,
    क्या सरकार को हमारी परवाह ही नहीं?
    बहुत ही दर्द भरी पंक्तियाँ एवं भयावह स्थिति।

    Liked by 1 person

  2. This lock down has shown an even harsh picture of poverty and wage gap in India. Back in school we used to read the lines in social science that one major problem In India is poverty, the indian roads currently is full of those people and we are helpless.
    Very disturbing reality. 😢
    Stay safe.

    Liked by 1 person

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