चुनाव और कोरोना

जिस कोरोना वायरस के 500 से नीचे आंकड़े निकलने पर सब कुछ बंद करने की रणनीति बनने लगी थी। आज की तारीख में हर दिन लगभग 10000 मामले सामने आ रहे हैं, पर अब चेहरे पर शिकन नहीं है। सही बात है ज्यादा चिंता करना सिर के बाल और सर जी का हाल दोनों खराब कर सकता है। वैसे भी अब हम आत्मनिर्भर बन गए हैं, हमें कोई चीनी वायरस जैसी चीज का डर नहीं रहा।

सब रोकना समस्या का हल नहीं है। पर सब कुछ सही है, यह मानना भी गलत ही है। लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग भी आजकल राजनीतिक दुशाला ओढ़े किसी कोने में ध्यान मग्न रहता है। जब अपने काम की बात आती है तो औपचारिकता के तौर पर कुछ टिप्पणी कर देता है। धीरे-धीरे समझदारों का प्रकार और आकार भी बदल रहा है। ज्ञानी आपको फेसबुक और ट्विटर पर ज्यादा मिल जाएंगे, उनके ज्ञान की गंगा फ्री में बहती रहती है। बिना किसी स्वार्थ और लाग लपेट के.

खैर कोरोना संकट को थोड़ा किनारे खिसका कर आजकल अन्य विषयों पर बाजार गर्म है। चीन को हर दिन सुबह से शाम तक चीनी कप में चाय और चीनी मोबाइल से सबक सिखाया जाता है। पाकिस्तान को भी एक दो बार दो चार गाली देना, अब सामान्य सा हो गया है। पाकिस्तान गली के उस कुत्ते सा है, जिसका पुराना भोंकना भी उसे पीटने के लिए काफी रहता है।

इसके बाद बारी आती है, विपक्ष के. कुछ राज्यों में विपक्षी झंडे अभी भी लहरा रहे हैं, जहां नहीं हैं वहां लहराने की तैयारी जारी है। ऐसे में सभी राजनीतिक दल इस कोरोना काल में वायरस वाली राजनीति खुलकर कर रहे हैं। वैसे सही भी है, उनका काम है अलग-अलग मुद्दों में काम की बात छांट कर उसमें एजेंडा मिलाकर प्रस्तुत करना।

वास्तव में राजनीति की गाड़ी, उसकी बयानबाजी और मनोदशा चुनावी हवा पर निर्भर करती है। जिस राज्य में चुनाव होते हैं, वहां के इतिहासकार और महान हस्तियां फ्रंट पेज पर आ जाती हैं। उस राज्य की मिट्टी से मां का प्यार झलकने लगता है और जनता के अंदर भगवान का अवतार. बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों से लेकर टूटी फूटी नालियों तक को सही करने की बात होती है। एक एक व्यक्ति को खुशहाल बनाने का दावा ठोका जाता है। जनता भी कुछ दिन के लिए खुद को विशेष मानने लगती है।

वास्तव में राजनेताओं का धरती पर जन्म चुनाव लड़ने के लिए ही हुआ है। जो नेता समाज सेवा और सुधार में वक्त जाया करने लगते हैं, उनको कुर्सी मिलने में भी वक्त लग जाता है। चुनाव के दौर में सभी वादों का तानपुरा लेकर घर घर पहुंच जाते हैं। जब तक वोट नहीं मिलता, यह संगीत बजता रहता है। उसके बाद असली रोना शुरू होता है।

अभी तो बिहार के चुनाव सामने हैं, जनता सिर पर हाथ रखकर अतिथियों का इंतजार कर रही है। पुराने वादे मिटाकर नए मुहैया करवाने की तैयारी जोरों पर है। दिमाग और शरीर से लोगों को मैदान में उतारा जाने लगा है। अभी कोरोना वायरस भी हैरान परेशान है, इतने दिन से उसे अकेले चर्चा में रखने वाले लोग अब बात भी नहीं कर रहे।लेकिन फिर भी, कोरोना के साथ जीने की नसीहत देने वाले, वोट जरूर कोरोना की छाया में देंगे.

Adityamishravoice
Twitter- @voiceaditya

4 thoughts on “चुनाव और कोरोना

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