कोरोना आखिर कब तक

लगभग 5 महीने से स्थिति सामान्य होने की आशा हर दिन कमजोर होती जाती है। अब तो कोरोना के साथ साथ कदमताल करने की नौबत आ गई है। जो नेगेटिव हैं, वह हर दिन बढ़ते आंकड़ों को सिर्फ अपडेट की तरह स्वीकार कर ले रहे हैं। एक दिन में देश के 60,000 से अधिक नागरिक संक्रमित हो रहे हैं। मतलब हर घंटे लगभग 2500 लोग कोरोनावायरस की चपेट में आ रहे हैं। टीवी पर सिर्फ न्यूज़ शतक में 5-10 स्लाइड के द्वारा खबर समेट दी जा रही है, विपक्ष भी राम मंदिर भूमि पूजन के सदमे में है।

आम आदमी किसी तरह जिंदगी को पटरी पर लाने की जद्दोजहद में लगा हुआ है। कई घर परिवार ऐसे भी हैं, जहां पिछले 5 महीने से ₹1 नहीं आया, लेकिन खर्च लगातार हो रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर अनलॉक 3.0 जारी है, वहीं क्षेत्रीय स्तर पर कहीं लॉकडाउन तो, कहीं अनलॉक का खेल चल रहा है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सप्ताह के दो दिन लॉकडाउन लगाकर कोरोना को रोकने का प्रयास किया जा रहा है। लेकिन परिणाम सबके सामने है, हर दिन 4000+ नये मामलों के साथ प्रदेश में कुल एक्टिव मरीज 44563 हो गए हैं। वहीं रिकवर होने वालों की कुल संख्या 66,834 है, प्रदेश में कोरोना से 1981 लोगों की जान जा चुकी है।

लोगों ने भी अब इस पूरे दौर को हल्के में लेना शुरू कर दिया है, ज्यादा जगहों के हालात ही बहुत कुछ बता रहे हैं। क्वारंटीन सेंटर में औपचारिकतावश लोगों को रखकर अपनी ड्यूटी निभाई जा रही है। लोग बिना व्यवस्था का रोना रोकर शांत हो जा रहे। मरीज पाजिटिव होने के बाद उसके घर तक को सैनेटाइज नहीं किया जा रहा। आप आवाज उठाने की कोशिश में थक जाओगे, लेकिन आवाज़ उठ नहीं पायेगी।

दूसरी तरफ मीडिया को हर दिन नया मसाला फ्री में मिल रहा, ऐसे में उन्हें खबरों की खोज नहीं करनी पड़ती। लोग भी इंटरटेनमेंट समझकर देख लिया करते हैं। देश में कुछ जगहों पर बाढ़ भी आई, कई लोगों ने अपनी नौकरी भी गंवाई है। कुछ घरों का हाल बेहाल है, कोरोना हो न हो डर बरकरार है।

बस हर दिन मीडिया में पाकिस्तान से लेकर चीन को आंख दिखाने की रणनीति बनाई जाती है, जबकि नेपाल तक आजकल भारत को सीरियसली नहीं ले रहा है। देश में मुद्दों के नाम पर पुरानी खबरों को गर्मी दी जा रही है। हर दिन आपको एक ही तरह का व्यंजन परोसा जा रहा।

राम मंदिर को ही ले लें, अब कोर्ट का निर्णय आ गया है। भूमि पूजन भी हो गया है, मंदिर जल्द बन भी जाएगा। पर फिर भी जो राख बची है, उसमें फूंक मार मार कर धुआँ करने का प्रयास हर दिन होता है।

हम कपोल कल्पनाओं में जीने के आदी हो गए हैं। आप एक बार सोच कर देखिए, देश में हर दिन 900 से अधिक लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। क्या यह सामान्य स्थिति है? शायद नहीं!

अभी तक रिकवरी रेट का उदाहरण देकर बचने की कोशिश की जा रही थी। अब एक्टिव केस भी 6 लाख को पार कर चुके हैं, मरने वाले लोगों की संख्या 42,000 से अधिक हो गई है। लेकिन फिर भी सब कुछ सामान्य है, यह जाहिर करने की कोशिश लगातार की जा रही है। सरकारें लोगों की भलाई के लिए होती हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य देना उनकी प्राथमिकता में है। पर हालात ठीक इसके उलट बनते जा रहे हैं। आत्मनिर्भर होने का मतलब यह होगा, किसने सोचा था?

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