जब कांटों पर चलना पड़ जाए

हर दिन सुबह खूबसूरत ही नहीं होती, कभी-कभी काले बादल सूर्य की किरणों को ढक देते हैं। हर एक रास्ता सीधा ही नहीं होता, कभी-कभी हमें कांटों पर भी चलना होता है। यहां कांटा देखकर घबराने की या रास्ता बदलने की बात नहीं हो रही है, यहां कांटों पर चलना है और पार जाना है। यही जिंदगी का असली अर्थ है. आप गुलाब की सुंदरता को निहारने के लिए जितने लालायित रहते हैं, उतना ही कांटो का सामना करने की इच्छा भी रखें।

जब कांटों पर चलना पड़ जाए,
जब हर पग ठोकर ही खाएं.
फिर चलते जाना है,
फिर भी मचलते जाना है.

जब तक कड़वाहट का स्वाद नहीं चखते हैं,
जब तक हम चलते चलते राह नहीं भटकते हैं.
आंखें जब पसीने से भीग जाती है,
तभी वह हमें असली अर्थ समझाती हैं.

कांटों को देखकर घबराया नहीं करते,
यू रास्ते को देखकर उकताया नहीं करते.
चलते जाते हैं, बस चलते जाते हैं.
रास्ते भी अपने आप ही बदलते जाते हैं.

Adityamishravoice

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16 thoughts on “जब कांटों पर चलना पड़ जाए

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