दो बूंद पेट्रोल की

जिंदगी की रफ्तार बहुत तेज है, इस रफ्तार को और गति देने के लिए हम एक तरीके के विशेष वाहन का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन आजकल न जाने क्यों वाहन का चलते-चलते गला ही सूख जा रहा था। इसी समस्या से निपटने के लिए जब डॉक्टर को दिखाया तो पता चला नई बीमारी हो गई है। अब इलाज के लिए पेट्रोलियो का टीका लगेगा। टीका पहले भी  लगता आया था, पर अब बीमारी के चलते कई बार लगाना पड़ सकता है। हम तो पहली बार इस तरह की बीमारी का नाम सुन रहे थे।

खैर, सबकी भलाई के लिए सोचा दवा भी करवा ली जाए। जब डॉक्टर से डिटेल मांगी तो उन्होंने कहा कि इलाज में काफी पैसे लगेंगे। हमने किसी तरकीब से इंतजाम किया और बताये गए पते पर पहुंच गए। वहां बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- पेट्रोल पंप। जानी पहचानी जगह थी, पर कभी इतनी शिद्दत से नहीं गए थे।

वहां लंबी लाइन लगी थी, हमने तो सोचा था इतना महंगा इलाज शायद सब न करा पाये, लेकिन यहां आकर पता चला कि अच्छे दिन आ गये थे, मुझे एहसास ही न हुआ था। सब अपने अपने वाहन और पैसे की गठरी दबाये खड़े थे। कुछ गरीब भी थे, जो पैसे नहीं इक्ट्ठा कर पाये थे। ऐसे सभी लोग साइकिल नामक वाहन का इस्तेमाल कर रहे थे। इस तरह के वाहन में दवा का चक्कर कम ही होता है। लागत काफी कम हो जाती है, पर शारीरिक मेहनत ज्यादा पड़ती है।

वैसे जब इस पेट्रोल पंप पर आये तो पता चला बीमार सब हैं, लेकिन जताता कोई नहीं है। सभी नाराज तो थे पर किससे, पता नहीं? सबको यह एहसास काफी पहले ही हो गया था कि अच्छे दिन आ गये हैं। बस समझने की देर भर थी। वैसे दिलचस्प बात यह थी कि जो नहीं समझ पाया था वह परेशान था, जो समझ गया था वह चुप था

अपने अपने नंबर पर सभी इलाज करा रहे थे, बस चंद सेकेंड में इलाज और जेब खाली। अपना भी नंबर आया हम भी पहुंचे जेब खाली की। सामने एक व्यक्ति खड़ा था, जिसके हाथ में पेट्रोलियो की ड्रॉप थी। इसी ड्रॉप में से सभी को दो-दो बूंद जिंदगी के मिल रहे थे। पहली बार ऐसा नजारा देखा था, इसके पहले तो यहां गंगा बहा करती थी। अब मामला सूखा-सूखा था, सामने बोर्ड लगा था- बूंद कहीं और गिरने पर कोई रिफंड नहीं होगा। कृपया अपनी बूंद-बूंद की रक्षा स्वयं करें।

वैसे गंगा अभी भी बह रही थी, पर वो सब आम आदमी की सांसों की कीमत से भी महंगी थी। लेकिन वाहन को जिंदगी दिलाने में खुद की जेब और सांस दोनों फूल गई थी। कुछ लोग यहां से सीधा अपना इलाज करवाने भी जा रहे थे।

वैसे इतनी चिंता क्यों हो रही थी, कोई पहली बार थोड़ी है। जब से यह वाहन आया है, अक्सर बीमार हो जा रहा था। जिंदगी की दौड़ लगाने वाला आदमी, पेट्रोल पंप के चक्कर लगाया करता था। अब वक्त थोड़ा बदल गया था, शायद दिन अच्छे आ गये थे। दिनों की खासियत यही होती है कि अक्सर इनके आने का एहसास जाने के बाद होता है।

अब कब तक दिन इतने ही अच्छे रहते हैं, या थोड़ा सहुलियत मिलती है पता नहीं। जब तक ऐसे दिन हैं, खुद को और अपने वाहन को दो बूंद जिंदगी के पिलाते रहो। जब तक है जान मुस्कुराते रहो।

-Adityamishravoice

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