चुनाव के दिन, तेरे बिन

यह आखिरी दिन था चुनाव प्रचार का और हमारी मोहब्बत का भी। पिछले 6 महीने से हम एक दूसरे को बहुत पसंद कर रहे हैं। बिन कहे तारीफ हो रही है और बिन मांगे मुराद मिल रही है। थोड़े समय के लिए ही सही लेकिन यह मोहब्बत समाज के लिए मिसाल जैसी है। सोचो अगर ऐसा ही पूरे 5 साल होता रहे तो कितना बढ़िया होगा। लेकिन ऐसा होता नहीं,

दरअसल किसी भी रिश्ते को ज्यादा लंबे समय तक खींचना बड़ी समस्या का काम है। उसमें भी अगर नेता शामिल हों तो और मुश्किल बढ़ जाती है। जनता प्यार की भूखी है और नेता वोट के। लेकिन इस भूख का ख्याल सिर्फ आखिरी के 6 महीने में ही आता है। इसके अलावा साढ़े 4 साल आत्मनिर्भरता में गुजर जाते हैं।

राजनीति का वैलेंटाइन हॉफ ईयर यही होता है, इसमें हर दिन फूड डे, स्कीम डे, लॉलीपॉप दे और हैप्पीनेस डे मनाया जाता है। तरह-तरह की योजनाएं, प्रलोभन हर दिन परोसे जाते हैं। कई बार यह प्यार जनता को कुछ ज्यादा ही लगता है, लेकिन उसका भी दिल बहुत बड़ा है। ऐसे छोटे-मोटे सवालों पर आसानी से पर्दा डाल दिया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि यह पर्दा भी मखमली होता है।

नेताओं का घर आना-जाना भी शुरू हो जाता है। परिवार से मिलना-जुलना, साथ बैठकर खाना खिलाना, दो अच्छी बातें करना और फोटो खिंचवाना। ऐसा लगता है मानो जैसे रिश्ता पक्का हो जाएगा। लेन-देन की बात भी बैक डोर से हो जाती होगी क्योंकि दहेज प्रतिबंधित है ना।

चुनाव खुशियों का सबसे बड़ा कारण है। अगर यह चुनाव ना होता तो वोट की भूख ना होती। यह मोहब्बत ना होती तो यह रिश्ता नहीं होता, फिर कौन किसे पहचानता? इक वोट ही तो है जो इस बंधन को बांधे रखता है।

रिश्ते में मोड़ तब आता है, जब चुनाव के बाद प्यार की भूखी जनता अपने पुराने आशिक के दरवाजे पहुंचती है। तब रास्ते में कई अड़चनें आती है, सब को पार करके अगर उस तक पहुंच भी गए तो रिश्तों को याद दिलाने में अगले 5 साल बीत जाते हैं।

लेकिन इतना समय नहीं होता, अपने पास सिर्फ 5 मिनट होता है। उसी 5 मिनट में अपनी भूख और प्यार दोनों को साबित करना होता है। काश जनता के पास भी कोई टाइम मशीन होती तो वह उस वैलेंटाइन हाफ ईयर में जाकर पहले ही रिश्ता तोड़ लेते। फिर ना रहता लगाव और ना होता चुनाव.

Adityamishravoice

3 thoughts on “चुनाव के दिन, तेरे बिन

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