आंखें हैं, तो गड़ाना पड़ेगा

आंख गड़ाने के लिए गिने चुने ऐप्स हैं, संख्या कम लग रही. भला हो इंस्टाग्राम रील्स का. कि समय, समय से कट जाता है. वरना सोचो आफत की बात है, 10 बजे सोकर उठे, फिर क्या किया जाए!
ब्रश मंजन जल्दी हो जाता है, वाशरूम में भी एक गेम का समय लगता है. अब आगे क्या किया जाए!
टीवी पर वही पुरानी खिलाड़ी, दमदार खिलाड़ी, बदला, मेरा बदला… आता रहता है.
समय है कि बीतता नहीं! बताओ समस्या है ना?

इन सरकारों को सबसे पहले इंटरनेट की मात्रा और बढ़ानी चाहिए. इसके बाद कुछ अच्छे ऐप्स और खोजकर लायें, जहाँ एक बार आंखों को गड़ाओ तो सीधा नींद आने तक लगे रहो. समझ रहे हो ना, 12-14 घंटे का बैकअप मांगता है. क्योंकि नींद भी
जब हल्की लालिमा पूर्व दिशा में छाने लगती है, जब पंछी घोंसले से उड़ने का प्लान बनाते हैं. पत्ते डोलना और मुर्गे बोलना शुरू करते हैं.. तभी तो नींद आती है. ऐसे में पूरी तैयारी जरूरी है.

सीरीज भी कोई अच्छी आ नहीं रही, जो है, सब देखा-देखाया है. नये की तलाश में कुछ अच्छा पुराना भी मिल ही जाता है. वैसे भी ये आंखें गड़ाने का नशा कुछ भी करवा लेता है. हाथ की उंगलियाँ न चाहकर भी फोन खोलकर सामने कर देती हैं. फिर तो आगे दलदल है, निकलने का कोई रास्ता नहीं.
या तो फोन बंद हो जाये या फिर इंटरनेट. सिलसिला खत्म नहीं होता. जीवन का असली सत्य यही है, धरती पर कहीं स्वर्ग है तो मोबाइल में ही है.

Adityamishravoice

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